वैसे तो भारत में समय समय पर सामाजिक न्याय को लेकर आवाज़ें उठती आई हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वाकई में जिस सामाजिक न्याय की बात तमाम सरकारें और पार्टियां करती हैं, क्या वाक़ई वह समाज को एक सूत्र में बाँधने का काम करती है या मौजूदा खाई को और गहरा करने का काम करती हैं। भाजपा जिसे एक हिंदुत्ववादी पार्टी के रूप में देखा जाता है उसने सामाजिक न्याय को नया आयाम देने का काम किया है।
हिंदुत्व की छवि वाली भाजपा का सामाजिक न्याय
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामाजिक न्याय का होना बहुत ज़रूरी है लेकिन जब राजनैतिक दल सामाजिक न्याय के नाम पर किसी समाज को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने लगे या उसे अपना कोर वोट बैंक समझ लें, तो ऐसी स्थिति में चीज़ें बिगड़ने लगती हैं। कुछ ऐसा ही पिछले कुछ में भारत में देखने को मिला है। दरअसल, हिंदुत्व का परचम लहराने वाली भाजपा सामाजिक न्याय के नाम पर समाज को दो हिस्सों में बाँटने का काम कर रही है। एक धड़ा जो भारतीय संस्कृति से ख़ुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है और दूसरी ओर सामाजिक न्याय के ठेकेदार जो हाथ में संविधान की प्रतियाँ लहराने वाले और मुँह पर जय भीम का नारा लिए चलने वाले।
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मौजूदा समय में भाजपा अपनी मूल विचारधारा से इतर एक ऐसे समाज को साधने में लगी हुई है जो खुलकर हिंदू देवी – देवताओं और सनातन धर्म का अपमान करते हैं। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सत्तारूढ़ पार्टी को समाज के हर तबके को साधना पड़ता है ताकि वह सत्ता पर काबिज रहे। लेकिन जब किसी एक को दूसरे से बेहतर बताने की होड़ लग जाए, तो ऐसे में समाज में मौजूद खाई और गहरी होने लगती है। कुछ यही काम भाजपा भी अन्य पार्टियों की तरह लगातार कर रही है।
सामाजिक न्याय को बल देने के नाम पर मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार 2019 में कमलनाथ सरकार द्वारा पारित किए गए ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का बचाव करती है। हालांकि 9 अक्टूबर 2026 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 2019 के उस राज्य कानून को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया, जिसके तहत सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC के आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया गया था।
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UGC गाइडलाइंस और SC/ST एक्ट के नाम खेला दांव
साल 2018 में प्रिवेंशन ऑफ़ एट्रोसिटीज़ एक्ट जिसे अब SC/ST एक्ट के नाम से जाना जाता है, में संशोधन कर 22 प्रावधानों से 47 प्रावधान किया गया। इसके पीछे का मकसद समाज को न्याय संगत बनाने का था लेकिन भाजपा द्वारा संशोधित यह क़ानून मौजूदा समय में सबसे ज़्यादा दुरुपयोग किए जाने वाले क़ानूनों में से एक है। वहीं साल 2026 में आई यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर भाजपा को स्वर्ण समाज के गुस्से का सामना करना पड़ा। इसका असर सीधे तौर पर बांकीपुर उपचुनाव में देखने को मिला जहाँ भाजपा अपनी पारंपरिक सीट से हाथ धो बैठी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीति नबीन बांकीपुर सीट से विधायक रह चुके हैं।
केवल इतना ही स्वर्ण समाज का गुस्सा राजस्थान निकाय चुनावों में भी देखने को मिला जहाँ मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा को ख़ुद मैदान में उतरकर प्रचार करना पड़ा। ऐसे में माना यह भी माना जा रहा है कि अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी स्वर्णों के गुस्से के चलते भाजपा के हाथ से कई सीटें छिटक सकती हैं। फ़िलहाल भाजपा यूपी विधानसभा में मजबूत स्थिति में है लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए भाजपा समेत एनडीए 292 से 220 – 235 की बीच अटकती दिख रही है।