यूँ तो राष्ट्रवाद भारत में आज़ादी के समय से ही एक ऐसा मुद्दा रहा है जिससे हर भारतीय ख़ुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है। चुनाव से लेकर देश पर आए किसी भी संकट में राष्ट्रवाद का मुद्दा हमेशा से एक अहम मुद्दा रहा है। हालांकि पिछले कुछ समय में राष्ट्रवाद को लेकर देश के प्रमुख राजनैतिक दल एक दूसरे से अलग राय रखते नज़र आते हैं। इसे लेकर जो सबसे बड़ा कारण समझ आता है वो है विचारधारा से मतभेद। जहाँ 2014 से देश की सत्ता पर क़ाबिज़ भाजपा राष्ट्रवाद को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाकर आगे बढ़ती हुई नज़र आती है तो वहीं कांग्रेस, सपा, राजद और लेफ्ट पार्टियां राष्ट्रवाद को लेकर पूरी तरह से अलग अप्रोच अपनाती दिखाई पड़ती हैं। यही कारण है कि देश पर जब भी कोई संकट आता है तो यह तमाम विपक्षी दल कटघरे में खड़ी नज़र आती हैं।
भाजपा का राष्ट्रवाद का दाँव
2014 के बाद से भाजपा ने राष्ट्रवाद के मुद्दे को सबसे ज़्यादा बुनाने का काम किया है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां राष्ट्रवाद के मुद्दे पर या तो बैकफुट पर रहती हैं या अपने नेताओं के दिए गए बयानों पर घिरती नज़र आती हैं। उदाहरण के तौर राफेल फाइटर जेट्स को लेकर कांग्रेस द्वारा भाजपा पर उठाए सवालों से लेकर बालाकोट एयर स्ट्राइक तक इन सभी मुद्दों पर कांग्रेस ने जिस तरीके से भाजपा सरकार को घेरने की कोशिश की, उसपर बीजेपी ने नैरेटिव को राष्ट्रवाद की ओर मोड़कर चुनावों में कई बार लाभ उठाया।
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लेकिन अब सवाल यह भी है कि क्यों देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को लोग राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में क्यों नहीं देखते। तो इसका जवाब सीधा है, दरअसल जिस तरह तरीके से राहुल गांधी मौजूदा समय में मुद्दे उठाने और सरकार को घेरने का काम करते हैं वह अक्सर देश के सम्मान और कांग्रेस पार्टी को नुकसान पहुंचाने का काम करता है। यही वजह है कि 99 से ज़्यादा चुनाव हारने का दोष सत्ता पक्ष राहुल गांधी के ऊपर मढ़ता है। लेकिन अब सवाल यह कि आख़िरकार राहुल गांधी के किन बयानों को लेकर कांग्रेस पर राष्ट्रवादी न होने का आरोप लगाया जाता है। दरअसल भाजपा और उनके समर्थकों ने अक्सर उनके विदेशी दौरों पर दिए गए बयानों और सरकार की नीतियों की आलोचना को “देश-विरोधी” या “भारत की छवि खराब करने वाला” करार दिया है, जबकि कांग्रेस और राहुल गांधी का तर्क है कि वे केवल लोकतंत्र, संविधान और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार की कमियों को उजागर कर रहे हैं। इसके अलावा सितंबर 2024 में अमेरिका दौरे के दौरान राहुल गांधी ने भारत में सिखों की धार्मिक स्वतंत्रता और देश में आरक्षण खत्म करने को लेकर कुछ टिप्पणियां की थीं। इसके जवाब में भाजपा ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी विदेशी धरती पर भारत को सामाजिक रूप से विभाजित करने की कोशिश कर रहे हैं और खालिस्तानी या भारत-विरोधी तत्वों को बढ़ावा दे रहे हैं। इस पर पलटवार करते हुए राहुल गांधी और कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया और वे केवल समाज के सभी वर्गों के लिए समानता और न्याय की बात कर रहे थे। साल 2016 में हुई उरी सर्जिकल स्ट्राइक और 2020 भारत-चीन गलवान घाटी गतिरोध के बाद राहुल गांधी द्वारा सरकार से सबूत मांगने और सरकार की रणनीति पर सवाल उठाने को लेकर भारी विवाद हुआ था। वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को डेड इकॉनमी करार देना, वी आर फाइटिंग इंडियन स्टेट इटसेल्फ जैसे बयानों को लेकर भी राहुल गांधी ने भाजपा को राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे पर खेलने का मौका दिया। लेकिन इस कड़ी में केवल राहुल गांधी अकेले नहीं हैं जिनके बयानों पर भाजपा राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाती है, इस कड़ी में अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, उदयनिधि स्टालिन नेताओं के बयानों पर भी भाजपा सनातन धर्म और देश के अपमान का आरोप लगाती है।
मौजूदा समय के बदलते समीकरण
मौजूदा समय में जहाँ यूरोप के साथ साथ भारत भी आंदोलनों के दौर से गुज़र रहा है। जुलाई के महीने में पूर्व शिक्षा मंत्री के धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन से लेकर हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर हुए आंदोलन में शामिल हुए लोगों और इन प्रदर्शनों के मंचों से उठी बातों को लेकर एक बार फिर सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया तक राष्ट्रवाद की चर्चा तेज़ है। देश में एक प्रेशर ग्रुप के तौर पर तेज़ी से पैर पसारती कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े लोगों पर भी आए दिन विदेशी फंडिंग और विदेशी ताकतों के प्रभाव में काम करने का आरोप लगता है। केवल इतना ही नहीं हाली ही में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा देश में सत्ता परिवर्तन के आवाहन के बाद से एक बार फिर देश में राष्ट्रवाद बनाम देश में मौजूद देश विरोधी ताकतों का देश में सत्ता परिवर्तन और देश में अशांति फैलाने के इरादे को लेकर बहस छिड़ गई है।
यह कोई पहली बार नहीं है जब देश में सत्ता परिवर्तन को लेकर आवाज़ उठी हो नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में सड़कों पर उतरी युवाओं की उग्र भीड़ द्वारा सत्ता परिवर्तन के बाद भारत में भी कई बार इसी तरह की आवाज़ें सुनाई दी हैं। वहीं नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के कुछ समय पहले वी आर फाइटिंग इंडियन स्टेट इटसेल्फ वाले बयान के बाद यह कयास लगाए जाने लगे थे कि भारत में भी सत्ता परिवर्तन को लेकर ऐसी ताकतों को हवा दी जा सकती है जिससे देश में अशांति का माहौल पैदा हो। इसके अलावा आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल द्वारा नीट पेपर लीक विवाद के दौरान एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेपाल और बांग्लादेश में हुए छात्र आंदोलनों में हुए सत्ता परिवर्तन का हवाला दिया था। केजरीवाल ने भारत जेन ज़ी से सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने और सरकार से जवाबदेही मांगने की अपील की थी।
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वहीं अक्टूबर महीने में भी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के सलाहकार सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा यानी सैम पित्रोदा ने जॉर्ज सोरोस फंडिंग का बचाव करते हुए भाजपा, आरएसएस, देश की संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए। इसके अलावा अंकल सैम ने राहुल गांधी की बौद्धिक क्षमता, दृढ़ता और साहस की तारीफ़ की।
विदेशों से भारत में हालत कितने बेहतर?
अल्बानिया, इटली और फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों के पीछे अलग-अलग स्थानीय कारण हैं, लेकिन महंगाई, ईंधन की ऊंची कीमतें, आवास संकट और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर असंतोष कई जगहों पर प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं। स्पेन और पुर्तगाल में भी महंगे आवास के खिलाफ विरोध के लिए टेंट कैंप लगाए गए हैं। वहीं भारत में हालात इस समय काफी बेहतर दिखाई पड़ते हैं। बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और अफ़वाहों के बीच भारत में प्रदर्शन अन्य देशों के मुकाबले उतने हिंसक नहीं हुए हैं। इसका श्रेय निश्चित तौर पर इंटेलिजेंस एजेंसीज और पुलिस खास तौर पर दिल्ली पुलिस को जाता है क्योंकि दिल्ली में हालत पिछले 3-4 महीनों से नाज़ुक बने हुए हैं।