विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने रविवार को कहा कि अमेरिका और चीन के बीच संबंध आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि दुनिया प्रतिस्पर्धा और जोखिम के नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।
जयशंकर ने ये बातें चौथे कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन (Kautilya Economic Conclave) में रखीं।
“स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि अमेरिका – चीन संबंध कई मायनों में वैश्विक राजनीति की दिशा को प्रभावित करने जा रहे हैं,” उन्होंने कहा।
अमेरिका और चीन की बदलती शक्ति-रणनीतियाँ
जयशंकर ने बताया कि दोनों शक्तियाँ अपनी वैश्विक रणनीतियाँ नए सिरे से गढ़ रही हैं।
“अमेरिका अब पहले से अधिक आक्रामक है और अपने राष्ट्रीय हितों को साझेदारी और सहयोग की नीतियों में प्राथमिकता दे रहा है, ” उन्होंने कहा।
चीन को लेकर उन्होंने कहा कि वह एक संक्रमण काल से गुजर रहा है।
“ यह परिवर्तन उस समय आया है जब चीन के कई नए विचार, तंत्र और संस्थाएँ अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुई हैं,” जयशंकर ने बताया।
यूरोप के लिए बदलते समीकरण
विदेश मंत्री ने कहा कि अब यूरोप के लिए पुराना सामरिक संतुलन खत्म हो गया है।
“पहले जहां अमेरिका सुरक्षा का, रूस ऊर्जा का और चीन व्यापार का आधार था — आज वे सभी यूरोप के लिए चुनौती बन चुके हैं,” उन्होंने कहा।
ऊर्जा क्षेत्र में नया संतुलन
जयशंकर ने बताया कि ऊर्जा क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव आया है।
“संयुक्त राज्य अमेरिका, जो दशकों तक बाहरी ऊर्जा पर निर्भरता से चिंतित था, आज आत्मनिर्भर और ऊर्जा निर्यातक बन चुका है,” उन्होंने कहा।
वहीं चीन नवीकरणीय ऊर्जा में अग्रणी बन चुका है।
“नवीकरणीय ऊर्जा की हर राह अंततः चीन तक ही पहुंचती है,” जयशंकर ने कहा।
शक्तियों में ‘संतुलन’ की सोच घटती जा रही है
जयशंकर ने कहा कि आज की महाशक्तियाँ ‘पावर बैलेंस’ की अवधारणा में कम विश्वास रखती हैं।
“उन्हें लगता है कि उन्हें बाकी दुनिया की उतनी जरूरत नहीं जितनी पहले थी। जब उनके पास शक्ति का अंतर है, तो वे उसे अपनी नीतियों में खुलकर इस्तेमाल कर रहे हैं,” उन्होंने कहा।
उन्होंने चेतावनी दी कि दुनिया में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और हर साधन को हथियार बनाया जा रहा है।
“आज वैश्विक परिदृश्य में लगभग हर चीज को हथियारबद्ध करने की प्रवृत्ति बढ़ गई है,” जयशंकर ने कहा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में ‘जोखिम और सुरक्षा’ का विरोधाभास
जयशंकर ने कहा कि वर्तमान समय की वैश्विक अर्थव्यवस्था एक विरोधाभासी स्थिति में है।
“कई घटनाएँ एक साथ हो रही हैं, जिससे एक ऐसी स्थिति बन रही है जहां एक ओर जोखिम उठाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तो दूसरी ओर राजनीति और अर्थशास्त्र को de-risk करने की कोशिश भी जारी है,” उन्होंने कहा।
अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा:
“यह कुछ ऐसा है जैसे आप trapeze की ऊँचाई बढ़ा रहे हों, लेकिन सुरक्षा जाल को नीचे से हटा रहे हों — यही आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति की वास्तविकता है।”