सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी के अलग रहने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि विवाह अपरिवर्तनीय रूप से टूट चुका है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों का व्यापक विश्लेषण अनिवार्य है।
‘यांत्रिक निष्कर्ष’ निकालने पर कोर्ट ने जताई आपत्ति
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने टिप्पणी की कि हाल के समय में अदालतें अक्सर अलगाव को विवाह टूटने का आधार मान लेती हैं। अदालत ने कहा कि पहले यह निर्धारित करना आवश्यक है कि अलग रहने की जिम्मेदारी किस पक्ष पर है और क्या किसी एक को मजबूर होकर अलग होना पड़ा।
अदालत ने चेताया कि बिना ठोस साक्ष्य के इस निष्कर्ष पर पहुंचना—विशेषकर जब बच्चे हों—गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट का तलाक आदेश रद्द किया
यह टिप्पणी उस समय आई जब अदालत ने एक महिला की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 2019 में उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा दिया गया तलाक का आदेश रद्द कर दिया।
दंपति का विवाह 2009 में हुआ था और 2010 में उनका पुत्र जन्मा। पति ने पहले क्रूरता के आधार पर तलाक का मामला दायर किया, जिसे उन्होंने वापस ले लिया। 2013 में उन्होंने फिर से—इस बार परित्याग के आधार पर—याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने आवश्यक मुद्दों पर विचार नहीं किया: सुप्रीम कोर्ट
ट्रायल कोर्ट ने तलाक याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे स्वीकार कर लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट पर आरोप लगाया कि उसने निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार नहीं किया:
- क्या पत्नी स्वयं घर छोड़कर गई या उसे बाहर निकाला गया?
- क्या पहली याचिका वापस लेने से दूसरी याचिका पर रोक लगती है?
- क्या पति ने पत्नी और बच्चे को बिना देखभाल और प्रेम के अलग रहने को मजबूर कर क्रूरता की?
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मामला पुनः विचार के लिए हाईकोर्ट को भेजा गया
अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने सभी पहलुओं का परीक्षण नहीं किया, और मामले को पुनः विचार के लिए वापस भेज दिया।
पक्षकारों को 24 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।