Bihar Election Results: बिहार की राजनीति में कल का दिन एक ऐतिहासिक दिन था क्योंकि जातीय समीकरण से प्रभावित बिहार की राजनीति में NDA ने रिकॉर्ड तोड़ जीत दर्ज की। अब सवाल खड़ा होता है कि NDA की इतनी बड़ी जीत के पीछे बड़े कारण क्या थे। क्या महागठबंधन का अति-आत्मविश्वास उनकी गाड़ी को ले डूबा या तेजस्वी-राहुल की जोड़ी जमीनी हकीकत को समझने में विफल रहे?
NDA की इस बम्पर जीत का श्रेय निश्चित तौर पर पीएम मोदी और सीएम नीतीश कुमार की जोड़ी को जाता है। NDA ने इस चुनाव में 243 में से 202 सीटें जीतकर एक लैंडस्लाइड विक्ट्री हासिल की। इस जीत का एक कारण यह भी था कि इस बार पूरा NDA एकजुट था और सभी पार्टियों का वोट बंटने के बजाये NDA की झोली में गया। 2020 के विधानसभा चुनावों में चिराग पासवान की एलजेपी NDA गठबंधन का हिस्सा नहीं थी जिससे जेडीयू का खेल बिगड़ा था लेकिन NDA इस बार पूरी तरह एकजुट था। हालांकि सीट बंटवारे के समय रसाकसी दिखने को मिली थी।
क्या थे NDA की जीत के कारण?
NDA की इस जीत का श्रेय मोदी-नीतीश की जोड़ी को तो जाता ही है साथ ही साथ इस जीत के पीछे कई और कारण भी रहे।
बिहार चुनावों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कार्यकर्ताओं ने सिवान, बक्सर, आरा, पटना, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज, भागलपुर, किशनगंज, पूर्णिया, सीतामढ़ी, दरभंगा, बेगूसराय, रोहतास, वैशाली और पूर्वी चंपारण समेत कई अन्य जिलों में ग्रासरूट लेवल पर काम किया जिससे NDA जमीनी हकीकत को बेहतर समझ पाई।
महागठबंधन का सबसे बड़े चुनावी वादों में था 200 यूनिट फ्री बिजली का जिसे काउंटर करने में नीतीश कुमार ने ज़्यादा समय न लगाते हुए 125 यूनिट फ्री बिजली का ऐलान कर दिया। यह ऐलान नीतीश कुमार ने ऐसे समय पर किया जब लोगों के बीच प्रीपेड मीटर को लेकर गुस्सा बढ़ रहा था। इससे न केवल ग्राउंड पर हालात बदले, बल्कि बिहार की जनता ने इसे एक सकारात्मक कदम की तरह देखा और इससे महागठबंधन के वादे के सामने ज़्यादा बल मिला।
इसी तरह तेजस्वी का ‘100% डोमिसाइल’ वाला वादा भी NDA ने चतुराई से पलट दिया। सरकार ने इसे सिर्फ महिलाओं के लिए लागू किया, जिनके पास पहले से 35% आरक्षण है। इससे महिलाओं वोटरों का भरोसा NDA पर बढ़ा।
महिलाओं ने निभाई ‘किंगमेकर’ की भूमिका
बिहार के चुनावी रण में इस बार महिलाओं ने फिर साबित किया कि वे राजनीतिक रूप से निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं का मतदान प्रतिशत 71.6% रहा, जबकि पुरुषों का 62.8%।
पहले चरण में 69.04% महिलाओं ने वोट डाला, जबकि दूसरे चरण में यह आंकड़ा बढ़कर 79.04% तक पहुंच गया। साइकिल योजना, पोशाक योजना, छात्रवृत्ति, स्वयं सहायता समूह, सरकारी नौकरियों में 33 – 50% आरक्षण, और सबसे अहम था महिलाओं के खातों में ‘महिला रोजगार योजना’ के तहत सीधा दस हज़ार रुपये ट्रांसफर।
इसके अलावा तेजस्वी यादव को पहले से सीएम के चेहरे पर प्रोजेक्ट करना महागठबंधन के हित में नहीं गया। मुकेश साहनी को डिप्टी सीएम का चेहरा घोषित करना भी पूरी तरह विफल तरह साबित हुआ। माना जा रहा है कि यह नेता ज़मीन पर आम लोगों से जुड़ने में विफल रहे जिससे न तो इन पार्टियों पर जनता ने भरोसा जताया और न ही इनके द्वारा की गई घोषणाओं को गंभीरता से लिया।
इसके अलावा महागठबंधन की हर परिवार में एक नौकरी, डोमिसाइल पॉलिसी, और महिलाओं को लुभाने वाली योजनाओं पर भरोसा नहीं किया।
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NDA का ‘जंगलराज’ का नैरेटिव
एनडीए ने आरजेडी के खिलाफ जो सबसे बड़ा हथियार अपनाया और वो था ‘जंगलराज’ का नैरेटिव। भाजपा, जेडीयू और लोजपा के बड़े नेता लगातार लोगों के बीच ‘जंगलराज’ का मुद्दा लेकर जा रहे थे। और माना जा रहा है कि जो वोटर मध्यम आयु वर्ग के हैं उन्हें आरजेडी का समय अच्छे से याद रहा जिसकी वजह से इस वर्ग ने बड़े स्तर पर एनडीए को वोट दिया।
इसके अलावा पीएम मोदी ने अपनी हर रैली में राजद पर निशाना साधते हुए बिहार की जनता को ‘जंगलराज’ का समय याद दिलाया। सोशल मीडिया पर फैले वीडियो, स्टेज पर ‘कट्टा-संस्कृति’ वाले गाने और पुरानी यादों की पुनरावृत्ति ने NDA का नैरेटिव और मजबूत किया। पीएम मोदी कई मंचों से महिलाओं को संदेश देते हुए दिखे ‘जंगलराज को वापस मत आने दीजिए’ का सीधा असर दिखा और महिलाओं के साथ-साथ मिडल क्लास का एकतरफा समर्थन NDA की झोली में गया।
पीएम मोदी ने जन संवाद और रैलियों में जनता से सीधा संपर्क किया और हर मुद्दे को विस्तार से जनता के बीच लेकर गए। इस चुनाव में अमित शाह ने यह भी अहम भूमिका निभाई और हर भाषण में एनडीए के रोडमैप और उपलब्धियों को गिनवाया। गृह मंत्री अमित शाह ने यहां तक कहा कि ‘बिहार में सीएम की वेकन्सी और केंद्र में पीएम के लिए कोई पद खाली नहीं हैं’। इसके अलावा उन्होंने एनडीए की जीत का बड़ा क्लेम किया था और कहा था कि एनडीए 160 सीटों से ऊपर जीतने वाली है। इसके अलावा भाजपा के बड़े नेता जैसे दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या और धर्मेंद्र प्रधान जैसे नेताओं ने बड़ी भूमिका निभाई। धर्मेंद्र प्रधान तो मानो बिहार में बस से गए थे जिसका फायदा बिहार के चुनावी परिणामों में साफ तौर पर देखने को मिल रहा है।
इसके अलावा एनडीए का गांव-गांव तक पंचायत लेवल पर मॉनिटरिंग करना, बूथ मैनेजमेंट, सोशल मीडिया नैरेटिव, EBC और दलित घरों पर फोकस करना काफी फायदेमंद साबित हुआ।
इसके आगे महागठबंधन पूरी तरह बिखरा हुआ दिखा। सीट बंटवारे में देरी, मतभेद, गलत घोषणाएं और खराब संदेशों ने पूरा कैंपेन बिगाड़ दिया। AIMIM की एंट्री और प्रशांत किशोर की पार्टी के फेल होने ने महागठबंधन का माहौल और कमजोर किया। वहीं राजद अपनी पुरानी छवि सुधारने में असमर्थ रहा। कहानी यहां तक नहीं रुकी और तेजस्वी यादव ने सहाबुद्दीन जिंदाबाद के मारे लगाए और उसके बेटे ओसामा को रघुनाथपुर से टिकट दी और उसने 9 हज़ार वोटों से जेडीयू के विकास कुमार सिंह को हराया भी। लेकिन सहाबुद्दीन जिंदाबाद के नारे और ओसामा को रघुनाथपुर से टिकट दिए जाने का मुद्दा भाजपा ने बखूबी उठाया। वहीं छपरा से राजद प्रत्याशी सिंगर और एक्टर खेसारी लाल यादव ने राम मंदिर को लेकर विवादित बयान दिया था। खेसारी ने कहा था कि ‘राम मंदिर की जगह वहां अस्पताल बनना चाहिए था।’ इसके अलावा छठ पूजा पर दिए गए राहुल गांधी के बयान को भी भाजपा ने बड़ा मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
इसके अलावा बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों से एक दिन पहले RJD के विधान पार्षद सुनील सिंह ने चेतावनी दी थी कि यदि मतगणना में किसी प्रकार की धांधली हुई, तो बिहार “नेपाल या बांग्लादेश जैसा” बन सकता है। और उन्होंने चुनाव अधिकारियों से निष्पक्षता और ईमानदारी से काम करने की अपील की और कहा कि किसी भी तरह की धांधली करने वाले “ज्यादा समय तक सत्ता में नहीं टिक पाएंगे।” जिसके बाद विवाद बढ़ने के तुरंत बाद बिहार DGP ने सुनील सिंह के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया था। अधिकारियों ने उनके बयान को “उकसाने वाला” और “अस्थिरता पैदा करने वाला” बताया था।
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महागठबंधन को ले डूबा अति-आत्मविश्वास
अभी वोटों की गिनती शुरू ही हुई थी कि तेजस्वी यादव ने शुक्रवार सुबह (14 नवंबर 2025) को कह दिया कि वह 18 नवंबर को शपथ लेंगे न्होंने पत्रकारों से कहा था, ‘शुभकामनाएं, बदलाव हो रहा है।’ लेकिन तेजस्वी को नहीं पता था कि जब तक सूरज आसमान में सिर तक आएगा, तब तक आरजेडी की लालटेन बुझ चुकी होगी। तेजस्वी की अगुआई वाला आरजेडी गठबंधन महज 35 सीटों पर सिमट गया। अब आपको 5 साल पीछे ले चलते हैं। 2020 में विधानसभा चुनाव के दौरान तेजस्वी यादव ने महागठबंधन की जीत की आस में शेरवानी सिलवाई थी। लेकिन उनकी पार्टी को महज 110 सीटों से संतोष करना पड़ा था। हालांकि आरजेडी पिछले विधानसभा चुनाव में सिंगल लार्जेस्ट बनकर उभरी थी लेकिन तब भी बहुमत के आंकड़े से 12 सीट दूर था। राजद के लिए यह चुनाव किसी बुरे सपने से कम नहीं था जिस मुस्लिम-यादव वोट बैंक के सहारे वह राज्य की सियासत में जमे हुए हैं, उसे भी तगड़ा झटका लगा है। हालांकि यादव वोटरों ने आरजेडी को समर्थन दिया है। लेकिन सीमांचल क्षेत्र यानी किशनगढ़, कटिहार, पूर्णिया और अररिया में मुसलमान वोटों में ओवैसी की AIMIM ने तगड़ा झटका दिया। साल 2010 में आरजेडी ने 22 सेटें जीती थी और 2015 में 80 सीटों पर कब्जा जमाया था जिसके बाद राजद और जेडीयू ने गठबंधन कर सरकार बनाई थी जिसमें कांग्रेस भी एक मजबूत कड़ी की तरह काम कर रही थी। 2020 में, आरजेडी 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, क्योंकि चिराग पासवान के की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) एनडीए से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ी और जेडीयू को नुकसान पहुंचाया था और जदयू का नुकसान खुद ब खुद राजद के लिए फायदेमंद साबित हुआ था। 2025 तक आते-आते महागठबंधन के हालात इतने खराब हो गए हैं कि राजद पिछली बार के मुकाबले आधी सीटों पर आ गई है। इस बार आरजेडी ने अपना आधार बढ़ाने के लिए सात दलों के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश जरूर की, लेकिन वह कामयाब नहीं हुआ। कांग्रेस गठबंधन की कमजोर कड़ी बनी रही और सीपीआई (एम-एल) लिबरेशन, विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) और इंडियन इंक्लूसिव पार्टी (आईआईपी) जैसे अन्य सहयोगी भी उसके जातिगत समीकरण में कोई खास योगदान नहीं दे पाए।
अब राजद के लिए आत्मचिंतन का समय आ गया है। जहां तक बात रही कांग्रेस की तो सबसे पुरानी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस लगातार एक के बाद विधानसभा चुनाव में फेल हो रही है। राहुल गांधी इस समय कांग्रेस की सबसे कमजोर कड़ी बने हुए हैं लेकिन कांग्रेस पार्टी उनके इर्द-गिर्द घूमती नज़र आती है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि कांग्रेस अब अपनी विचारधारा को छोड़ कर ज़्यादा लेफ्ट की तरफ जा चुकी है लेकिन सच तो यह है कि कांग्रेस लेफ्ट के साथ दलित और मुस्लिम अपीज़मेंट की राजनीति करती आई है। कांग्रेस के पूर्व नेता और प्रवक्ता आचार्य प्रमोद कृष्णम कई मंचों से कह चुके हैं कि ‘यह कांग्रेस महात्मा गांधी की कांग्रेस नहीं रही, अब यह पार्टी को कुछ चंद लोग चलाते हैं।’ हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है क्योंकि आजादी के बाद से कांग्रेस ने सेंटर-लेफ्ट की राजनीति की और एक समय तो ऐसा आया कि लेफ्ट के समर्थन से सरकार भी चलाई। यही नहीं आपातकाल के दौरान लेफ्ट ने कांग्रेस को समर्थन दिया था। इसके अलावा कई मुद्दों पर कम्युनिस्टों और कांग्रेस के नेताओं की भाषा में कोई अंतर नहीं दिखता।
नहीं चला ‘PK’ फैक्टर
प्रशांत किशोर से NDA का जितना बज़ सोशल मीडिया पर रहा उतना ग्राउंड जीरो पर दिखाई नहीं दिया। ऐसा लग रहा था कि वे दोनों ही पार्टियों को जमकर नुकसान पहुंचाएंगे लेकिन ऐसा लगता है कि अभी भी बिहार का जातीय समीकरण को तोड़ने में PK सफल नहीं हो पाए हैं। 27 सौ गांवों में पदयात्रा करने के बाद उन्होंने पार्टी बनाई। उन्होंने बिहार के मानस को जानने का दावा किया इसके अलावा पॉलिटिक्स प्लानर के रूप में उनकी साख ने भी उनके इर्द-गिर्द अच्छा खासा माहौल बना दिया था।
फिर उनका ही दावा था कि अर्श पर रहेंगे या फर्श पर…यानी या तो 10 सीटें जीतेंगे या 150 ….हालांकि यह बात अलग है कि उनके दोनों ही दावे गलत निकले। उनकी पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई। वे किसी भी गठबंधन के वोटरों में ज्यादा सेंध नहीं लगा पाए। ऐसा कहा जा सकता है कि कुल मिलाकर उनका असर बहुत ही सीमित रहा। हालांकि उन्होंने जो मुद्दे उठाए वो आगे भी बिहार की राजनीति में ज़िंदा रहेंगे। पलायन से लेकर बिहार में बढ़ती बेरोजगारी का मुद्दा अब भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना चुनाव से पहले था और यह माना जा सकता है कि अगर प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी ग्राउंड पर काम करते रहे और आने वाले चुनावों में उनके लिए दरवाज़े खुलने के आसार हैं।
नहीं चला फटीग फैक्टर
चुनावों से कुछ महीने पहले ऐसा माहौल बनाया गया कि नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में उतने प्रभावी नहीं रहे। उनकी उम्र और स्वास्थ्य से बिहार का काफी नुकसान हो रहा है। खराब स्वास्थ्य के चलते वो जन सभाओं और कई इवेंट से दूर ज़रूर थे लेकिन ग्राउंड पर उन्हें लेकर लोगों के बीच खास नाराज़गी नहीं थी। 20 साल के लंबे शासन के बाद भी नीतीश पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं है हालांकि कई बार अपने अटपटे बयानों को लेकर उन्हें लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा।
इन सभी चीज़ों के बावजूद बिहार के लोगों ने न सिर्फ़ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर फिर से भरोसा जताया बल्कि भाजपा समेत पूरे गठबंधन को प्रचंड बहुमत दी। इससे एक बात तो साफ है कि सोशल मीडिया पर राहुल गांधी के भले ही बहुत से समर्थक हो जो उनकी बातों को आगे बढ़ाने का काम करते हैं लेकिन उन्हें वोट नहीं मिलता। और बात सिर्फ वोट तक सीमित नहीं है राहुल गांधी और कांग्रेस जिस भी राज्य में क्षेत्रिय दलों के साथ गठबंधन में आती है वहां कांग्रेस के साथ-साथ उन दलों को भी नुकसान उठाना पड़ता है।
क्या कहता है बिहार का जातीय समीकरण?
वैसे तो पूरे भारत में जातियों का प्रभाव चुनावों में साफ तौर पर देखने को मिलता है लेकिन जब बात आती है बिहार कि तो चीज़ें बदल जाती है। अगर हम बिहार की आबादी में श्रेणीवार जनसंख्या देखें तो पिछड़ा वर्ग की आबादी करीब 27.12 फीसदी, अति पिछड़ा वर्ग की आबादी करीब 36.01 फीसदी, अनुसूचित जाति की 19.65 फीसदी, अनुसूचित जनजाति की 1.68 फीसदी और अनारक्षित वर्ग की आबादी करीब 15.52 फीसदी है। इस सर्वे में 196 जातियों को आरक्षित श्रेणी में रखा गया है। इन 196 जातियों में से 112 अति पिछड़ी जातियों की सूची में, 30 पिछड़ी जातियों की सूची में, 22 अनुसूचित जाति की श्रेणी में और 32 अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में हैं।
इनके अलावा जिलाधिकारियों ने 10 ऐसी जातियां भी रिपोर्ट की जिन्हें न तो राष्ट्रीय और न ही प्रदेश की सूची में नोटिफाइड किया गया है. ये जातियां हैं- बंगाली कायस्थ, खत्री, धारामी, सुतिहार, नवेसूद, भूमिज, बहेलिया, रस्तोगी, केवानी और दर्जी।
किसे मिले कितने वोट?
बिहार में बनिया समाज के लोगों का प्रभाव 52 सीटों पर दिखाई देता है जिसमें से NDA को 47 और महागठबंधन को 5 सीटें मिली। भूमिहार समाज का प्रभाव 46 सीटों पर है जिसमें से NDA 33 और MGB 13 जीता। ब्राह्मणों का प्रभाव 41 सीटों पर है जिसमें एनडीए 37 और MGB 4 जीत पाया। वहीं EBC का प्रभाव 141 सीटों पर जिसमें एनडीए 123, MGB 16 जबकि 2 अन्य के खाते में गई। कायस्थों का प्रभाव 8 सीटों पर है जिसमें एनडीए ने सभी सीटें अपनी झोली में डाली। कुर्मी प्रभावित सीटों पर 38 में से 35 एनडीए और 3 महागठबंधन के खाते में गई। कुर्मी + कोइरी प्रभावित 70 में से 61 पर एनडीए आगे रहा, महागठबंधन को 8 और अन्य के खाते में 1 सीट गई। कुशवाहा प्रभावित कुल 51 सीटें हैं जिसमें से एनडीए 43, महागठबंधन 7 और अन्य के खाते में एक सीट गई। मुसहर की 10 में से 9 सीटें एनडीए ने जीती जबकि सिर्फ़ 1 सीट MGB के खाते में गई। मुस्लिम प्रभावित 39 सीटों में से एनडीए ने यहां भी बाजी मारते हुए 26 सीटें जीती, MGB ने केवल 8 और बाकी 5 अन्य के खाते में गई। MY यानी मुस्लिम + यादव प्रभावित 85 सीटों पर एनडीए ने 68 सीटें जीती, MGB 12 पर रहा और 5 अन्य के खाते में गई। निषाद प्रभावित 23 सीटों पर एनडीए ने 20 जीती और MBG के खाते में 3 सीटें गई। नोनिया प्रभावित सभी 5 सीटें एनडीए के खाते में गई। ओबीसी प्रभावित 166 सीटों में से 133 सीटें एनडीए ने जीती 28 MGB ने 28 और 5 अन्य के खाते में। पसमंदा समाज प्रभावित कुल 59 में से एनडीए के पास 45 सीटें गई, MGB के पास 9 और अन्य के खाते में 5 गई। पासवान प्रभावित सीटों पर 44 में से 40 एनडीए और 4 MGB की झोली में गई। बिहार में राजपूतों का प्रभाव 61 सीटों पर है जिसमें से 53 एनडीए के खाते में, 7 MGB के और 1 अन्य के खाते में गई। SC प्रभावित कुल 69 सीटें हैं जिनमें से 61 एनडीए, 7 महागठबंधन और अन्य ने जीती। ST प्रभावित 6 सीटों में से 3-3 सीटें दोनों गठबंधों को मिली। अपर कास्ट हिंदू प्रभावित कुल 64 सीटें हैं जिसमें से एनडीए ने 52 जीती और MGB ने 12। और अंत में यादव प्रभावत सीटें हैं 127 जिसमें से एनडीए ने 101 पर जीत हासिल की, 21 पर MGB ने बाजी मारी 5 अन्य के खाते में गई।