सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अनुच्छेद 143 के तहत दुर्लभ राष्ट्रपति संदर्भ पर अपना सलाहात्मक मत जारी करते हुए कहा कि कोई भी संवैधानिक संस्था अलग-थलग होकर कार्य नहीं कर सकती। सभी संवैधानिक प्राधिकरण परस्पर निर्भर भूमिकाओं के माध्यम से संविधान को सक्रिय रखते हैं।
‘संविधान तभी चलता है, जब उसे चलाया जाए’: सुप्रीम कोर्ट
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के स्थान पर CJI बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पाँच-न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ—जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और एएस चंदुरकर शामिल थे—ने कहा कि सभी संवैधानिक संस्थाएँ घड़ी के पुर्ज़ों की तरह हैं, जिन्हें मिलकर आगे बढ़ना होता है।
पीठ ने कहा, “हमारी संवैधानिक योजना तभी काम करती है जब इसे काम में लाया जाए… निष्क्रियता इस व्यवस्था के विपरीत है।”
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‘डीम्ड असेंट’ और तय समयसीमा का विचार खारिज
राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए 14 कानूनी प्रश्नों पर निर्णय देते हुए कोर्ट ने कहा:
- राज्यपाल बिलों को अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रख सकते।
- लेकिन अदालतें राज्यपालों या राष्ट्रपति के लिए तय समयसीमाएँ नहीं बना सकतीं, क्योंकि यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ होगा।
- कोर्ट ने ‘डीम्ड असेंट’ (निर्धारित समय बाद स्वीकृति मान लेना) के विचार को असंवैधानिक बताते हुए अस्वीकार कर दिया।
सीमित न्यायिक हस्तक्षेप संभव
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के निर्णय बिल स्तर पर चुनौती नहीं दिए जा सकते, लेकिन यदि उनकी निष्क्रियता से संवैधानिक प्रक्रिया ठप हो जाती है, तो अदालतें उन्हें “उचित समय” में निर्णय लेने का निर्देश दे सकती हैं।
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बिल के पारित होने से पहले न्यायिक समीक्षा नहीं
पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालतें यह जांच नहीं कर सकतीं कि बिल सही तरीके से पारित हुआ या नहीं, क्योंकि न्यायिक समीक्षा केवल तब संभव है जब बिल कानून बन जाए।
पीठ ने इस मामले में 10 दिनों तक सुनवाई की थी और 11 सितंबर को निर्णय सुरक्षित रखा था।