भारत के तेजी से बढ़ते म्यूचुअल फंड उद्योग में एक चिंताजनक रुझान सामने आया है। रिकॉर्ड SIP रजिस्ट्रेशन के बावजूद, उद्योग के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 90% निवेशक तीन साल के भीतर ही अपनी SIP बंद कर देते हैं, जिससे दीर्घकालिक संपत्ति निर्माण प्रभावित होता है।
भावनात्मक निर्णय निवेशकों को करता है विचलित
वित्त विशेषज्ञ बताते हैं कि SIP छोड़ने का यह सिलसिला एक भावनात्मक चक्र के कारण होता है—
- पहला साल: उत्साह और उम्मीदें।
- दूसरा साल: छोटी गिरावट भी डर पैदा कर देती है, निवेशक SIP रोक देते हैं।
- तीसरा साल: मार्केट सुधरता है तो पछतावे के साथ निवेशक वापस आते हैं।
यह चक्र—उत्साह, डर और पछतावा—SIP के मूल उद्देश्य को ही कमजोर कर देता है।
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SIP रोकने का बड़ा नुकसान
धन प्रबंधकों का कहना है कि SIP में रुकावट कंपाउंडिंग के प्रभाव को गंभीर रूप से कम कर देती है।
₹5,000 की मासिक SIP 20 साल में 12% रिटर्न पर ~₹45 लाख बनाती है।
लेकिन तीन साल रुकने से लगभग ₹15 लाख की कमी हो सकती है, केवल मिस्ड कंपाउंडिंग के कारण।
वोलैटिलिटी में मिलता है असली लाभ
विश्लेषकों के अनुसार गिरावट के समय SIP करना सबसे फायदेमंद होता है क्योंकि निवेशक कम कीमत पर ज़्यादा यूनिट खरीदते हैं।
इसके बावजूद, अधिकतर लोग इसी समय निवेश रोक देते हैं।
अनुशासन ही दीर्घकालिक निवेश की कुंजी
विशेषज्ञ कहते हैं कि हर मिस्ड किस्त वित्तीय लक्ष्यों को पीछे धकेल देती है। अनुभवी निवेशक मार्केट साइकिल को सामान्य मानते हुए लगातार निवेश करते रहते हैं।
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धैर्य से बनती है संपत्ति, टाइमिंग से नहीं
सलाहकारों का मानना है कि ऐतिहासिक रूप से बाजारों ने धैर्यवान निवेशकों को पुरस्कृत किया है।
निष्कर्ष स्पष्ट है — संपत्ति बाजार में बने रहने से बनती है, न कि समय तय करने से।