पाकिस्तान इस समय पिछले एक दशक के सबसे हिंसक दौर से गुजर रहा है। इस्लामाबाद स्थित सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज (CRSS) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 के पहले नौ महीनों में ही 2,400 से अधिक सुरक्षा कर्मी मारे गए हैं — जो 2015 के बाद का सबसे भयावह आंकड़ा है।
साल की तीसरी तिमाही में ही 901 लोगों की मौत और 599 घायल हुए, जो पिछले चरण की तुलना में 46% की वृद्धि दर्शाता है। इस वर्ष की मृत्यु दर 2024 की तुलना में 58% अधिक रही है। खास बात यह है कि इस बार अधिकांश मौतें आतंकवादी हमलों में नहीं, बल्कि सरकारी आतंकवाद-विरोधी अभियानों के दौरान हुई हैं।
हिंसा के केंद्र
सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र खैबर पख्तूनख्वा (KP) और बलूचिस्तान हैं — जहां क्रमशः 71% और 25% मौतें हुईं। सिंध में भी हत्याओं में 162% की वृद्धि दर्ज की गई। विश्लेषकों का कहना है कि व्यापक सैन्य अभियानों के बावजूद विद्रोह और उग्रवाद बढ़ता जा रहा है।
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‘आतंक की चौकड़ी’
देश की आंतरिक हिंसा चार प्रमुख समूहों से संचालित हो रही है — तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP), बलूच उग्रवादी, इस्लामिक स्टेट खुरासान (IS-K) और पाकिस्तान विरोधी तालिबान गुट। 2021 में काबुल में तालिबान की वापसी के बाद, TTP ने अफगान क्षेत्र से हमलों को और तेज कर दिया।
बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने चीनी परियोजनाओं और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर हमलों को बढ़ा दिया है, जिससे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) को गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ है।
बलूचिस्तान की जंग
खनिज संपदा से भरपूर बलूचिस्तान आज युद्धक्षेत्र बन चुका है। खुज़दार और ज़ेहरी जैसे ज़िले स्थायी लॉकडाउन में हैं। ड्रोन हमलों में नागरिकों की मौतें हो रही हैं, और गुमशुदगियों का सिलसिला जारी है। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे की स्थिति चरमराई हुई है।
1948 से चली आ रही बलूच असंतोष की लहर को आर्थिक उपेक्षा और सैन्य दमन ने और भड़काया है। पाकिस्तान का आरोप है कि BLA अफगानिस्तान के तालिबान-नियंत्रित क्षेत्रों में छिपकर हमलों की योजना बना रही है, जिसमें मार्च 2025 की जाफ़र एक्सप्रेस हाईजैकिंग भी शामिल है।
सीमा पर जंग का माहौल
हाल ही में पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर तीव्र लड़ाई छिड़ी। पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने तालिबान के हमलों के बाद 19 अफगान पोस्ट पर कब्ज़ा कर लिया, जबकि काबुल ने 58 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की बात कही। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर भारी नुकसान का आरोप लगाया।
क्यों बिगड़ रही स्थिति
विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान की दशकों पुरानी “रणनीतिक गहराई” की नीति अब उसके खिलाफ जा रही है। तालिबान अब अपने राजनीतिक और आर्थिक हित साधने के लिए आतंकवादी समूहों को इस्तेमाल कर रहा है। अफगानिस्तान में नशीले पदार्थों और फिरौती के जरिए वित्तपोषित नेटवर्क, अमेरिकी हथियारों की उपलब्धता के साथ, इन समूहों को और ताकतवर बना रहे हैं।
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क्षेत्रीय असर
हिंसा का प्रभाव सीमाओं से बाहर फैल रहा है। इस वर्ष ईरान और पाकिस्तान के बीच बलूच सीमा क्षेत्र में मिसाइल हमले हुए। वहीं, तालिबान की आक्रामकता चीन को भी इस संघर्ष में खींच सकती है। पाकिस्तानी सेना ने चेतावनी दी है कि अफगान भूमि से आतंकवाद की अनुमति बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
जो देश कभी तालिबान को बढ़ावा देकर रणनीतिक लाभ चाहता था, वह अब उन्हीं ताकतों से चार मोर्चों पर जूझ रहा है — और अपने आधुनिक इतिहास के सबसे रक्तरंजित वर्षों में से एक का सामना कर रहा है।
पाकिस्तान 2015 के बाद अपने सबसे हिंसक वर्ष से गुजर रहा है, जहां 2025 में अब तक 2,400 से अधिक सुरक्षा कर्मी मारे गए हैं। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान हिंसा के केंद्र बने हैं। “आतंक की चौकड़ी” — टीटीपी, बलूच उग्रवादी, आईएस-के और तालिबान गुट — ने हमले तेज कर दिए हैं। अफगान सीमा संघर्ष और बलूचिस्तान की अस्थिरता ने पाकिस्तान को चार मोर्चों पर उलझा दिया है।