पाकिस्तान की सेना एक नई रणनीतिक योजना पर काम कर रही है जो अरब सागर क्षेत्र की शक्ति-संतुलन को बदल सकती है।
सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर के सलाहकारों ने अमेरिका को पाकिस्तान के तटीय शहर पासनी में बंदरगाह बनाने और चलाने का प्रस्ताव दिया है।
सूत्रों के अनुसार, यह चर्चा जनरल मुनीर की व्हाइट हाउस में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मुलाकात से पहले हुई थी। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह अभी तक औपचारिक प्रस्ताव के रूप में राष्ट्रपति या उनकी टीम तक नहीं पहुंचा है।
व्यापारिक केंद्र, सैन्य अड्डा नहीं
1.2 अरब डॉलर की लागत वाला यह पासनी पोर्ट प्रोजेक्ट एक व्यापारिक और लॉजिस्टिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा — न कि किसी सैन्य ठिकाने के रूप में।
ईरान से 100 मील और चीन के ग्वादर पोर्ट से 70 मील की दूरी पर स्थित पासनी की स्थिति बेहद रणनीतिक है।
योजना के तहत:
- पासनी से रेक-दीक (Reko Diq) खदान तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना है, जिसे कनाडाई कंपनी बैरिक गोल्ड संचालित करती है।
- वित्तपोषण पाकिस्तान सरकार और अमेरिकी विकास निधियों से किया जाएगा।
यह परियोजना पाकिस्तान के तांबा (Copper) और एंटीमनी (Antimony) जैसे खनिजों के निर्यात पर केंद्रित होगी, जो बैटरियों, फायरप्रूफ सामग्रियों और हथियार निर्माण में इस्तेमाल होते हैं।
प्रस्ताव में स्पष्ट उल्लेख है कि यह अमेरिकी सैन्य अड्डा नहीं होगा, जिससे संप्रभुता संबंधी चिंताओं को दूर किया गया है।
अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधने की कोशिश
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान चीन और अमेरिका के बीच संतुलन साधने की रणनीति पर काम कर रहा है।
जहां चीन ग्वादर पोर्ट को अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत चला रहा है, वहीं पासनी में अमेरिकी निवेश की संभावना पाकिस्तान को दोनों पक्षों से लाभ दिला सकती है।
अगर योजना लागू होती है, तो पाकिस्तान के तट पर अमेरिकी और चीनी वाणिज्यिक गतिविधियाँ एक-दूसरे के बेहद करीब होंगी — जो एक अभूतपूर्व स्थिति होगी।
भारत के लिए क्या मायने रखता है यह प्रस्ताव
भारत के लिए यह खबर नई सामरिक जटिलताएँ लेकर आई है।
ईरान के चाबहार पोर्ट, जहां भारत ने 250 मिलियन डॉलर का निवेश किया है और 10 साल का संचालन समझौता किया है, से पासनी की दूरी बहुत कम है।
हालांकि, 29 सितंबर को अमेरिका द्वारा ईरान पर फिर से प्रतिबंध लागू करने से भारत की 120 मिलियन डॉलर की चाबहार परियोजना पर असर पड़ सकता है।
विडंबना यह है कि जिस समय अमेरिका भारत के ईरान प्रोजेक्ट पर दबाव बढ़ा रहा है, पाकिस्तान उसे पासनी में निवेश का अवसर दे रहा है।
भारत के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार जैसी है:
- सकारात्मक पक्ष: अमेरिकी उपस्थिति से चीन की नौसैनिक गतिविधियों पर अंकुश लग सकता है।
- नकारात्मक पक्ष: पाकिस्तान की अमेरिका में रणनीतिक अहमियत बढ़ेगी, जिससे भारत-अमेरिका संबंधों में जटिलता आ सकती है।
अरब सागर: बढ़ती प्रतिस्पर्धा का नया केंद्र
अरब सागर अब तेजी से एक ऐसा क्षेत्र बनता जा रहा है, जहां अमेरिका, चीन, भारत और पाकिस्तान के हित आपस में टकरा रहे हैं।
भारत की नौसेना के लिए इसका अर्थ है — पश्चिमी समुद्री तट पर नई रणनीतिक निगरानी और तैयारी की जरूरत।
पाकिस्तान की कूटनीतिक चाल
पासनी पोर्ट प्रस्ताव यह दिखाता है कि पाकिस्तान ने वैश्विक शक्ति-संतुलन की नई हकीकत को समझ लिया है —
अब दक्षिण एशिया की राजनीति अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता से तय होती है।
भले ही यह योजना लागू हो या न हो, पाकिस्तान का यह कदम स्पष्ट रूप से उसकी रणनीतिक सोच को उजागर करता है —
जहां वह महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा को अपने आर्थिक लाभ और राजनीतिक महत्व के लिए उपयोग करना चाहता है।